हे सर्वेश्वर हे जगतपाल;
हे औढ़रदानीं महाकाल।
हे भूतेश्वर हे नागेश्वर ;
हे बर्फ़ानीं हे विश्वभाल।।
जुग-जुग तेरा आशीष रहे
भारत का उन्नत शीश रहे,
हे रामेश्वर हे जगदीश्वर ;
हे दीनबंधु हे अमरीश्वर ।
हे शिवशंकर हे भंडारी ;
हे अभयंकर हे प्रलयंकर।।
हे नीलकंठ हे अमरकंठ ;
जुग-जुग तेरा आशीश रहे
भारत का उन्नत शीश रहे
हे जगदंबा शिवपटरानी ;
हे महाकालिका कल्यानीं।
हे शत्रु शमन करने वाली
हे दुष्टदलनि सुर रक्षानीं।।
जुग-जुग तेरा आशीश रहे
भारत का उन्नत शीश रहे
हो मंगल-मंगल दिशा-दिशा।
बरसाये अमृत निशा-निशा।।
मिट जाये शत्रू दंभि क्रूर।
सपने हो उसके चकनाचूर।।
हे धुरयटी हे उमाँपति
जुग-जुग तेरा आशीश रहे
भारत का उन्नत शीश रहे।।
पंडित अनिल
अहमदनगर महाराष्ट्र
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें