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पावस ऋतु

Anil Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बरसे मेघा दादुर गावे मगनमगनमन
        
                                                    
                            
नाचे मोर लखे बदरिया छगनछगनमन
झिंगुर ताल मिलावे रामा टननटननटन
बिजुरी चमके करे धरा को नमननमनधन

फूस की टाट से आई जो बौछार सननसननसन
दुबक गए बच्चे गुदड़ी में किकुर दननदननदन
नई दुल्हन की बज जाए छागल छननछननछन
मिट्टी ढेले सा पिघले गृह मुखिया मन गलनगलनगन

पावस ऋतु की बूंदे है देती नवलनवलवन
पर,निर्बल खातिर वर्षा है जलनजलनहन
सुर में चले बयार झार कर झननझननझन
नव मेघों का दल करता है गरजनगरजन

पत्तों से झरता संगीत है पलनपलनपन
उमड़ि घुमड़ि डरपावे मनवा घननघननघन
लड़े दंत बृद्धन के कटकट कननकननकन
वृक्षों की टहनी झलकोरे हननहननहन

© पंडित अनिल
अहमदनगर महाराष्ट्र
3 वर्ष पहले
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