विज्ञापन

वापसी

Ankit Nayak

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            फिर लौटने का मन करता है
        
                                                    
                            
आज़ाद रहने का मन करता है
धूल को समेट कर गीली माटी से
उँगलियों के निशाँ बनाने का मन करता है
आवारा गलियों में कद से दुगुनी
सवारी करने का मन करता है
गांव में तालाब के घाट पर बैठकर
मछलियों से खेलने का मन करता है
यहाँ जीवन कुछ बंधा सा है
कुछ तागे खोलने का मन करता है
दिन-ब-दिन बहती नीरसता में
कुछ रस घोलने का मन करता है
लौटना तो निश्चित ही दीखता है
क्योंकि अक्सर सब छोड़ देने का मन करता है
फिर लौटने का मन करता है
आज़ाद रहने का मन करता है
और इन सब से ज़रूरी भी कुछ है
अपनी लय में लौटने का मन करता है।



हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

SANDEEP PANDEY

80 कविताएं

View Profile

Arjun Prabhat

37 कविताएं

View Profile