ये आतंकों के गालों पर दिल्ली के चांटे होते,
गर हमने दो के बदले में बीस शीश काटे होते
बार- बार दुनिया के आगे हम ना शर्मिंदा होते
और हमारे सारे सैनिक सीमा पर ज़िंदा होते
ये कैसा परिवर्तन है खुद्दारी के आचरणों में
सेना का सम्मान पड़ा है चरमपंथ के चरणों में
किसका ख़ून नहीं खौलेगा सुन-पढ़कर अख़बारों में
सिंहों की गर्दन कटवा दी चूहों के दरबारों में ।
बार-बार की गद्दारी को भारत क्यों सह जाता है
ज़्यादा संयम भी दुनिया में कायरता कहलाता है
हमने 68 साल खो दिए श्वेत कपोत उड़ाने में
ख़ूनी पंजों के गिद्धों को गायत्री समझाने में
भैंस के आगे बीन बजाना बहुत हो चुका बंद करो
खुद को बिच्छू से कटवाना बहुत हो चुका बंद करो
नागफनी पर बेला चंपा कभी नहीं खिलने वाले
पत्थर की आंखों में आंसू कभी नहीं मिलने वाले
बंदूकों की गोली का उत्तर सद्भाव नहीं होता
हत्यारों के लिए अहिंसा का प्रस्ताव नहीं होता
कोई विषधर कभी शांति के बीज नहीं बो सकता है
और भेड़िया शाकाहारी कभी नहीं हो सकता है
पीपल छाया मांग रहा था यूं कीकर के पेड़ों से
जैसे कोई शेर सुरक्षा मांग रहा हो भेड़ों से
जैसे कोई मोती खो दे झीलों की गहराई में
हम कश्तूरी खोज रहे हैं उल्लू की परछाईं में ।
शब्द खत्म हो जाऐं तो बंदुकों से बात करो,
जिस भाषा में शत्रु समझे उस भाषा में बात करो,
वीर शहीदों की अर्थी पर राजनीति जब होती है,
तब व्याकुल भारत माता भी चुपके-चुपके रोती है,
उस माता के दामन खातिर अब हमको लडना होगा,
बहुत बन चुके गाँधी अब तो भगत सिंह बनना होगा।
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