ऐ पुष्प तुम इतना कैसे खिलखिला रहे?
एक दिवस बीता तुम्हें खिले,
और दो दिन बचे तुम्हारे हैं निशेष
ये सब जान के भी तुम, हर पल कितना मुस्कुरा रहे।
ऐ पुष्प तुम इतना कैसे खिलखिला रहे?
मृदु ऐसे हो जैसे रेशे,
हल्के फुल्के नाजुक ऐसे।
पराग को भीतर छुपाये हुए
दुस्तर अभिप्रायों से नव जीवन को बचाये हुए।
ऐ पुष्प तुम इतना कैसे खिलखिला रहे?
सुन्दरता है आकर्षण का पाश
खुशबू लाती कितनों को तुम्हारे पास
कहीं कोई भंवरा आ तुम्हें चूस ले
या माली तोड़ तुम्हें बेच दे।
ये सब जान के भी तुम, निर्भय सब को अपने होने का भान करा रहे।
ऐ पुष्प तुम इतना कैसे खिलखिला रहे?
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