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रस धार है नारी !

Arjun Prabhat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रस धार है नारी !
        
                                                    
                            

प्रकृति की कल्पना कोमल मधुर रस धार है नारी ।
नहीं नर से कहीं कम सृष्टि का श्रृंगार है नारी।।

ये नारी स्नेह की प्रतिमा, ये ममता का भरा गागर
दया की है बनी देवी, हृदय में प्रेम का सागर
क्षमा ,ममता, तपस्या,त्याग का भंडार है नारी ।
नहीं नर से कहीं कम ,सृष्टि का श्रृंगार है नारी।।

यही मां बन के दुलराती,प्रिया का प्यार देती है
बहन बन बांधती राखी,मधुर मनुहार देती है
हृदय के साज़ का सुन्दर, सरस झंकार है नारी ।
नहीं नर से कहीं कम ,सृष्टि का श्रृंगार है नारी।।

इसी ने सभ्यता का पाठ मानव को पढ़ाया है
पकड़ कर हाथ नित सन्मार्ग पर चलना सिखाया है
कभी आदेश का स्वर है, कभी मनुहार है नारी ।
नहीं नर से कहीं कम ,सृष्टि का श्रृंगार है नारी।।

ये गार्गी है ये मैत्रेयी ,यही है भारती, सीता
यही मीरा, यही राधा ,ये लक्ष्मी बाई सुपुनिता
यही लक्ष्मी, सरस्वती, चंडिका अवतार है नारी ।
नहीं नर से कहीं कम ,सृष्टि का श्रृंगार है नारी।।

ये नारी फूल सी कोमल, धरा जैसी सहनशीला
विविध रूपों में करती है धरा पर यह विविध लीला
कभी कोमल कली है यह कभी अंगार है नारी ।
नहीं नर से कहीं कम ,सृष्टि का श्रृंगार है नारी।।

इसी से है सुखी जीवन ,इसी में प्यार पलता है
इसी का त्याग दीपक बन यहां दिन रात जलता है
कभी मथुरा कभी काशी कभी हरिद्वार है नारी ।
नहीं नर से कहीं कम ,सृष्टि का श्रृंगार है नारी।।
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4 वर्ष पहले
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