कोरोना ने
जिंदगी ही बेदखल कर दिया इस कोरोना ने।
बंदगी के तरीके ही बदल दिया है कोरोना ने।
खान-पान,क्रय-विक्रय,मेल-जोल दुआ–सलाम,
आना-जाना तक बदल दिया है कोरोना ने।
रोटी असमंजस में और भूख किँकर्तव्यविमूढ़
आदमी को बेकार बना दिया है कोरोना ने।
आदमी के अंगों पर आपातकाल का कर्फ़्यू
हाथ;नाक,मुंह न छूए ऐसा कहा कोरोना ने।
मौत पर मातम बंद है, मातम मर गया है
प्रेम,स्नेह की व्याख्या भी बदला कोरोना ने?
श्मशानों,दफ्नगाहों में आम प्रवेश बंद किया
कंधों को देने से कंधा मना किया कोरोना ने।
नीति, राजनीति व राष्ट्रनीति पर प्रश्न चिन्ह
सरकारी नीयत तक खोल दिया कोरोना ने।
सारा खोखलापन मानवीय सभ्यता का बेपर्दा
और तार-तार कर दिया है इस कोरोना ने।
सामाजिकता पर व्यक्तिगतता हो रहा भारी
बंदिशों को सामाजिक कर दिया कोरोना ने।
जीव,जीवन का शत्रु एक छोटा सा विषाणु हुआ
कर लिया खुद को अत्यंत बड़ा कोरोना ने।
आदिम काल से रोग ने किया ही है अचंभित
पहले प्लेग,हैजा आदि इत्यादि अब कोरोना ने
रोगों की संभावनाओं को नापना,तौलना आवश्यक
चिकित्सा आगे रहे, चुनौती दिया कोरोना ने।
एक नये समुद्र-मंथन को पुन:जन्म देकर,
अमृत पाने का उतावलापन दिया कोरोना ने।
शिव के पुनर्जन्म को आ दे,आवाहन आदमी
तुम्हें कोने,किनारे में धकेला है कोरोना ने।
तुम्हारे अंदर है धन्वन्तरि,पतंजलि ऐ आदमी!
करो प्रकट इतना तो अवश्य कहा कोरोना ने।
अमृत-घट सनातन का मानसिक विवेक है।
विष विहीन जीवन है सुनाया कोरोना ने।
बाजार और पूजाघर शोर-गुल को तरसते।
गली,सड़क को वीरान किया कोरोना ने।
एकांतवास में घर है इतना नहीं था कभी
उदास इसे कोर तक किया कोरोना ने।
कोरोना काल में नभ निर्मल तो हुआ।
दूषित कितना था बताया कोरोना ने।
खग की चहचहाहट से कान खुल गए
शोर में बंद थे ये बताया कोरोना ने।
खुशियों को इंतजार है बनाया कोरोना ने।
सुख और सुकून दुर्लभ किया कोरोना ने।
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