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सत्य गाँव पृष्ठ 3

Arun Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सुबह तुम्हारा निर्मल,शीतल
        
                                                    
                            
भरा हुआ संगीत से गाँव.
चिड़ियों के कलरव गायन से
सरिता के कल-कल से गाँव.
धीरे-धीरे उठता सूरज
गौरव का सौन्दर्य बिखेरे,
सौन्दर्य का आश्चर्य बिखेरे.
ठहर-ठहर जाता है गाँव.
स्वर्ग यहीं ही करता होगा
स्वर्गिक सुख का अनुभव गाँव.
मचल देवगण जाते होंगे
यहाँ जन्म लेने को गाँव.
वीणा झंकृत होती सी है
जलतरंग भी बजता गाँव.
किसी यशोदा का जब कान्हा
आंचल पकड़ ठुमकता गाँव.
कलकल करती बहती सरिता
तेरे ही पिछवाड़े गाँव.
झूठा हो-हो जाता आकर
यहाँ राज,रजवाड़े गाँव.
कोयल कू,कू करती थकती,
कभी न तेरे प्रांगण में.
शिशु सा निश्छल तेरा मन है
यहाँ जन्म हम फिर लें गाँव.
रुनझुन-रुनझुन पायल बजता
तेरे ही घर-द्वारे गाँव.
ठुमक ठुमक चले रामचन्द्र.
तेरे ही अंगना में गाँव.
छलछल छलका करता माखन
चुप-चुप कान्हा उसे चुराता.
और शिकायत लेकर आते
गाँव-गाँव की सखियाँ गाँव.
पुष्प सुसज्जित केश घने पर
डलिया शोभित होता गाँव.
मेंहदी रचित मृदुल हाथों में
कचिया शोभित होता गाँव.
श्रम पर क्यों सौन्दर्य मरे ना
भक्तों पर जैसे भगवान.
पैर महावर से रंजित है
जल का घड़ा उठाये पांव.
झुलसे, जले खाक हो जाये
धर्म न छोड़े ऐसा गाँव.
चलते रहते धर्म-रह पर
रहे सलामत या टूटे पांव.
कालयवन जाकर सोता हो
अंधकार के गुफा-गर्भ में.
दौड़ लगाकर चला किया है
कृष्ण का तन-मन तेरा गाँव.
आतुरता तुम नहीं दिखलाते
पाने की कुछ चाह न गाँव.
क्यों हताश है होना तुमको
खोना तो कुछ भी नहीं गाँव.
बहुत और बिलकुल निर्लिप्त ही
जीना तुमने सिखा है.
देना ही देना तुमको है .
देकर सुख पाते हो गाँव.
सुरभित पवन प्रवाहित होता
तेरे ही प्रांगण में गाँव.
स्वर्गिक सुख,आनंद,प्रसन्नता,
ईश्वर आते तेरे घर-घर गाँव.
सेवा में सर्वस्व निछावर
करने को तत्पर रहता है.
प्रेम वचन ही बोले सर्वदा
सदा स्वार्थ से उपर गाँव.
सावन की घनघोर घटा से
तेरा अद्भुद नाता गाँव.
तू उछले,मन बांसों उछले
झुक-झुक जब यह फैले गाँव.
शीतल होता ताप से झुलसा
तन बेचारा,मन बेचारा
वारि विन्दु जब-जब है झरता
और वचन मृदु तेरा हे,गाँव.
होने को जब हुई सभ्यता सभ्य
तुम्हीं ने अपना आंचल फैलाया.
पकड़ अंगुलियाँ शिशु सा तुमने
चलना इसे सिखाया गाँव.
तन कठोर,मन मृदुल, सरल है
नारिकेल का फल ज्यों गाँव.
देह ताप से चाहे झुलसा
श्रम का गौरव है पर,गाँव.
कर कोमल में धारण करके
हल,कुदाल; बलराम बने तुम.
लोक-गीत ओठों पर धरके
कृष्ण बने आते हो गाँव.
वनस्पति,वन,जीव,जन्तु में
हिले-मिले रहते हो गाँव.
जीवन के सुर,तान,गीत सब
यहीं कहीं मिलता है गाँव.
सूर्य,चन्द्र,नभ,तारे सरे
नियति,नियंता तेरे साथी.
‘वह’ वह राजा बिना मुकुट के
वह साम्राज्य तुम्हारा गाँव.
कहाँ,कौन सभ्यता है जग में
तरु की पूजा करता गाँव!
यह तो तेरा केवल तेरा
बड़ा बड़प्पन हे, सुंदर-गाँव.
किसलय,सुमन व मीठे फल सा
अहो,तुम्हारा है अंत:स्थल.
तरु से निकले पल्लव-दल सा
कोमल,स्निग्ध,मोहक तुम गाँव.

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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