वाह प्रकृति तेरे गुबरौले,
क्या कमाल हैं करते।
टट्टी की फुटबाल बनाकर,
उसको खेला करते।
नन्हें से हैं जीव बड़े ये,
मस्ताने-अलबेले।
लुढ़काते टट्टी का गोला,
कभी अकेले कभी दुकेले।
नेचर के ये जमादार हैं,
डैडी बोला करते।
वाह प्रकृति तेरे गुबरौले,
क्या कमाल हैं करते।
फुदक-फुदक कर दौड़ लगाते,
मौका मिलते ही उड़ जाते।
खेत में टट्टी को फैलाकर,
गोबर की ये खाद बनाते।
आ जाते ये दबे पाँव,
जब हम पाखाना करते।
वाह प्रकृति तेरे गुबरौले,
क्या कमाल हैं करते।
संघ आर्थ्रोपोडा इनका,
सुनो खोलकर कान।
इंसेकटा वर्ग है इनका,
कहता है विज्ञान।
अग्रपाद से ये अपने,
मल का विश्लेषण करते।
वाह प्रकृति तेरे गुबरौले,
क्या कमाल हैं करते।
बारिश के मौसम में इनका,
होता है अवतार।
पता नहीं टट्टी से इनको,
क्यों ज्यादा है प्यार।
छू लेने पर बेहोशी का,
ये हैं नाटक करते।
वाह प्रकृति तेरे गुबरौले,
क्या कमाल हैं करते।
ये फौरन मल के पहाड़ पर,
चल पैदल चढ़ जाते।
काट-काट कर मल के गोले,
नीचे को लुढ़काते।
अपने श्रम से ये हैं देखो,
सबको हतप्रभ करते।
वाह प्रकृति तेरे गुबरौले,
क्या कमाल हैं करते।
ये किसान के मित्र निराले,
मन के उजले तन के काले।
वह देखो मल के पहाड़ पर,
इनके झुंड उतरते।
वाह प्रकृति तेरे गुबरौले,
क्या कमाल हैं करते।
शौचालय निर्माण से इनको,
लगा बहुत आघात।
सुंदर-सुंदर मल के दर्शन,
अब होते नहीं दिन-रात।
लोटा लेकर शौच खुले में,
अब कोई भी न करते।
वाह प्रकृति तेरे गुबरौले,
क्या कमाल हैं करते।
कवि अरविन्द दुबे(मनमौजी)
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