पांच-छ:दशक पूर्व होता था बड़ा परिवार
भैया-भाभी,चाचा-चाची,मामा-मामी का मिले प्यार।
गली,मोहल्ले,परिवार के सब मिलकर देखते थे चित्रहार।
तीन-चार दशक पूर्व हम दो हमारे दो की आयी बहार
छोटा परिवार सुखी परिवार ने किया सीमित परिवार
उच्च शिक्षा के लिये बच्चे गये घर से बाहर
व्यापार,रोजगार के लिये चले गये भारत के बाहर
किराए पर छोटेछोटे फ्लैट में रहने को हुए मजबूर
मां-बाप को साथ में रखने को पायें हैं संस्कार।
नये ज़माने में है मोबाइल कम्पुटर का साथ
बच्चों को नहीं मिल पा रहा है मां बाप का हाथ।
अकेलापन से बच्चे भी हो रहें शिकार
बच्चे जातें हैं क्रेच के द्वार
वृध्द्धावस्था में जा रहे हैं वृधाश्रम के द्वार।
घर-परिवार से हो गया अब हो गया परिवार
सिमट कर रह गया परिवार
हो रहें हैं मानसिक तनाव के शिकार।
आज है परिवार दिवस
सब मिलकर करलें हास परिहास
चेहरे पर छा जायेगी खुशी,
परिवार का सदस्य नहीं रहेगा उदास।
अरविन्द कुमार शर्मा
जी0जी0रेजीडेंसी,
पश्चिमपुरी चौराहा
आगरा।
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