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आग का बीज

asha gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सुनो श्वेताम्बरा ....
        
                                                    
                            
सुना तो तब भी था न
जब दर्द चुपके से पांव पसारे
देहरी की सीमा लांघ आया था
और मेरी सारी संवेदनाओं को कुचल
उन्हें मृत मान बैठा था
उस समय क्या सुनी थी
किसी ने पुकार श्वेताम्बरा की
जब उसके श्वेत आंचल को झिझोड़ कर
सारे फूल जूही के बिखेर दिए गए थे
तब तुम कहाँ थे...
जब नदी हरियाई थी,
पत्तों ने नए धुनों से गीत रचा था
तब तुम कहाँ थे..
जब पवन ने मुझ तक आने के लिए
स्वांग रचा था..कहो न कहाँ थे तुम
तुम्हें याद है एक दिन जब
स्वप्न दौड़ते दौड़ते तुम्हारे पीछे
मेरी परिधि से हो गया था बाहर
तब भी यही विश्वास कि
वो तुम से मिल कर लौट आयेगा...
अपने साथ तुम्हारी सौंधी महक लिए
पर नहीं......
अब कहते हो कि आह को सुर्ख रंग दोगे
कैसा रंग ?...
कपोलो पर सूखे आसुंओं का ?
या मृत अनुभूतियों का काला रंग?
जिसकी वर्णमाला तैयार करोगे
और अपनी आह का विस्तार रचोगे
इसी दलदली भूमि पर मैंने भी तो
बोया हुआ है आग का बीज
नित्य वितृष्णा से जिसे सींचती हूँ
किसी दिन संभव है फूटे अंकुर
नयी नारंगी सी लपटों में
किसी दिन नई कोपलें निकले
कोई कस्तूरी सी गंध लिए
फिर जरूर मौसम बदलेगा
कोहरे भी छंट जायेंगे सब
तब संभव है तुम तक पहुंचे
कोई मदमस्त बयार..
तब हरित होंगे देखना एक दिन
श्वेतामाबरा के भावों के चिनार..।

- आशा गुप्ता 'आशु', पोर्ट ब्लेयर
 
2 वर्ष पहले
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