पीड़ा
इतनी पीड़ा क्यों दी मुझको,
जीवन रेगिस्तान हो गया ........
अधरों ने स्मृति भी भूली,
नयनों का चंचलपन भूला
तेरे नागफणी से मेरा
दिल तो लहुलुहान हो गया ।
इतनी पीड़ा क्यों दी मुझको,
जीवन रेगिस्तान हो गया
गीतों ने सुर है बिसराया
सरगम रीत गये सब मन के
तुम-सा मीत गवाँया जबसे
कविता का अवसान हो गया
इतनी पीड़ा क्यों दी मुझको
जीवन रेगिस्तान हो गया
घिरे घनद मुखड़ा पर ऐसे,
धूम भरी गोधूलि जैसे
पिघल पिघल आकाश-दीप मन
मेरा अब पाषाण हो गया
इतनी पीड़ा क्यों दी मुझको,
जीवन रेगिस्तान हो गया
अमरबेल बनना चाहा था
कल्पवृक्ष तुमको जाना था
कैसी वह्नी-लपट उठी कि
नन्दन वन वीरान हो गया
इतनी पीड़ा क्यों दी मुझको,
जीवन रेगिस्तान हो गया
डॉ आशा पुष्प