वियोगिन भटक रही बन-बन में
कहे मोहन मोहन पग धारी
सब भूल जाऊं तो हरी यादन मा
सब कुछ छाड्यो पिया तोहरे याद मा
लै हाथन वीणा करू भजन रे
वियोगिनी भटक रही बन-बन में
जग जन तंग भयो मेरो मनवा
तोहरे याद मा मेरो रोवत नयनों
विलखि विलखि गुण गान करै तेरो
भटक रही तोहरे चिन्तन मा
अब तो दरस दिखाना रे
वियोगिनी भटक रही बन-बन में
गिरधारी तुम ही हो प्रिय मेरे
राह चलूनिश नाम जपूं तेरो
तुम ही हो प्रभु सब कुछ मेरो
तुम्हारे दरस को आयो नगरी
है नाम रटत हर काम करन में
वियोगिन भटक रही बन बन में
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