विज्ञापन

ग़ालिब

Ashish Richhariya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                             ग़ालिब  
        
                                                    
                            


अब " ग़ालिब " कोई चीज़ तो  नहीं ,

खूंटे पर टंगी कोई उतरी कमीज तो नहीं ,


तुम्हारे अशारों में लिखा "ग़ालिब",

वो  मुक्कमल शायर तो कतई नहीं,


एक सदी है वो पूरी ,

एक समय की दिल्ली है वो पूरी ,


मेरठ कि  कच्ची गलियों की धूल  है ,

वहीं की अंग्रेजी शराब की ख़नक  है ,


ग़म से लदा हुआ कोई बोरा है,

सात औलादों की मौतों के बाद भी "खुदा-बैरी" है ,


उधारी में जीए वो जिंदिगी "ग़ालिब" है,

कोठे पर नाचती तवायफ़ की मुस्कराहट वो है,


अपनों की मौतों पर भी कलम उठा लिखता बादशाह  है ,

फ़कीरी में रुआब झाड़ उड़ता परिंदा "ग़ालिब" है ,


उर्दू को मुसलमान और हिंदी को हिन्दू न मानने वाला चेहरा है ,

बंगाल में जा अंग्रेज़ो के मुँह पर थूँकता हिन्दुस्तानी अशार है ,


हवा में घुल महकने वाली "चिड़ियों" सी चेहकने वाली खुशबू "ग़ालिब" है ,

जिसे अशद ने बर्बाद किया "मय " ने आज़ाद किया वो "ग़ालिब" है ,


"जौंक" की महफ़िल में बेज़्ज़ती महसूस करता शायर वो है,

जिसे आज सब पढ़ समझ नहीं सकते वो "इनायत " ग़ालिब  है ,


"गुलज़ार " के ऊपर का  क़र्ज़ ,

" कलम " के ऊपर का ब्याज,


" शब्द  " के ऊपर का ख़्याल ,

" सोच "  के ऊपर का सवाल ,


" दीवान " के ऊपर की छाप ,

" वाह "  के बाद की  मुक़र्रर ,


" मुक़म्मल " के बाद भी छूटी सिहाई ,

"उमराव बेगम " के दर्द का सहारा ,


शब्दों का पर्याय "जीतता" ,

"श्रेष्ठों "के ऊपर की सीढ़ी "ग़ालिब" है,


--शीष---


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all