ग़ालिब
अब " ग़ालिब " कोई चीज़ तो नहीं ,
खूंटे पर टंगी कोई उतरी कमीज तो नहीं ,
तुम्हारे अशारों में लिखा "ग़ालिब",
वो मुक्कमल शायर तो कतई नहीं,
एक सदी है वो पूरी ,
एक समय की दिल्ली है वो पूरी ,
मेरठ कि कच्ची गलियों की धूल है ,
वहीं की अंग्रेजी शराब की ख़नक है ,
ग़म से लदा हुआ कोई बोरा है,
सात औलादों की मौतों के बाद भी "खुदा-बैरी" है ,
उधारी में जीए वो जिंदिगी "ग़ालिब" है,
कोठे पर नाचती तवायफ़ की मुस्कराहट वो है,
अपनों की मौतों पर भी कलम उठा लिखता बादशाह है ,
फ़कीरी में रुआब झाड़ उड़ता परिंदा "ग़ालिब" है ,
उर्दू को मुसलमान और हिंदी को हिन्दू न मानने वाला चेहरा है ,
बंगाल में जा अंग्रेज़ो के मुँह पर थूँकता हिन्दुस्तानी अशार है ,
हवा में घुल महकने वाली "चिड़ियों" सी चेहकने वाली खुशबू "ग़ालिब" है ,
जिसे अशद ने बर्बाद किया "मय " ने आज़ाद किया वो "ग़ालिब" है ,
"जौंक" की महफ़िल में बेज़्ज़ती महसूस करता शायर वो है,
जिसे आज सब पढ़ समझ नहीं सकते वो "इनायत " ग़ालिब है ,
"गुलज़ार " के ऊपर का क़र्ज़ ,
" कलम " के ऊपर का ब्याज,
" शब्द " के ऊपर का ख़्याल ,
" सोच " के ऊपर का सवाल ,
" दीवान " के ऊपर की छाप ,
" वाह " के बाद की मुक़र्रर ,
" मुक़म्मल " के बाद भी छूटी सिहाई ,
"उमराव बेगम " के दर्द का सहारा ,
शब्दों का पर्याय "जीतता" ,
"श्रेष्ठों "के ऊपर की सीढ़ी "ग़ालिब" है,
--शीष---
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