कभी शाम की शुरुआत के समय
बिना किसी सूचना के
बनारस शहर में घुस जाओ
कभी आरती के आलोक में इसे अचानक देखो
अद्दभुत है इसकी बनावट
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में
आधा फूल में,आधा शव में
आधा नींद में हैं आधा शंख में
अगर ध्यान से देखो तो यह आधा है
और आधा नही है।
इस शहर में धूल धीरे धीरे उड़ती है
धीरे धीरे चलते हैं लोग
धीरे धीरे बजते हैं घंटे
शाम धीरे धीरे होती है
यह धीरे धीरे होना,धीरे धीरे होने की सामूहिक लय दृढ़ता से बांधे है समूचे शहर को
इस तरह की कुछ भी गिरता नहीं है
की हिलता नहीं है कुछ भी
की जो जहाँ थी वहीं पर राखी है
की गंगा वहीं हैं
वहीँ पर बंधी है नाव
की वहीं पर रखी हुई है तुलसीदास की खड़ाऊ
सैकड़ो बरस से....
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