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बनारस

Ashish Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी शाम की शुरुआत के समय
        
                                                    
                            
बिना किसी सूचना के
बनारस शहर में घुस जाओ
कभी आरती के आलोक में इसे अचानक देखो
अद्दभुत है इसकी बनावट
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में
आधा फूल में,आधा शव में
आधा नींद में हैं आधा शंख में
अगर ध्यान से देखो तो यह आधा है
और आधा नही है।
इस शहर में धूल धीरे धीरे उड़ती है
धीरे धीरे चलते हैं लोग
धीरे धीरे बजते हैं घंटे
शाम धीरे धीरे होती है
यह धीरे धीरे होना,धीरे धीरे होने की सामूहिक लय दृढ़ता से बांधे है समूचे शहर को
इस तरह की कुछ भी गिरता नहीं है
की हिलता नहीं है कुछ भी
की जो जहाँ थी वहीं पर राखी है
की गंगा वहीं हैं
वहीँ पर बंधी है नाव
की वहीं पर रखी हुई है तुलसीदास की खड़ाऊ
सैकड़ो बरस से....

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8 वर्ष पहले
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