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सच और झूठ....

Ashish Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सच और झूठ के बीच जीवन चला करता है।
        
                                                    
                            
ये ठीक है की कड़वापन नीम की गलती नहीं,
पसंद का माध्यम जीभ क्या बनी खुदगर्ज हो गई।
झूठ का भी भला कहीं ज़ायका होता है ?
दूसरा बोले तो कड़वा; खुद बोलो तो मीठा होता है,
सच को छुपाना भी झूठ बोलने के समान होता है।
झूठ याद रखना कठिन, और सच बोलना आसान होता है।
फिर भी झूठ का बाजार गरम होता है । ।
3 वर्ष पहले
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