सच और झूठ के बीच जीवन चला करता है।
ये ठीक है की कड़वापन नीम की गलती नहीं,
पसंद का माध्यम जीभ क्या बनी खुदगर्ज हो गई।
झूठ का भी भला कहीं ज़ायका होता है ?
दूसरा बोले तो कड़वा; खुद बोलो तो मीठा होता है,
सच को छुपाना भी झूठ बोलने के समान होता है।
झूठ याद रखना कठिन, और सच बोलना आसान होता है।
फिर भी झूठ का बाजार गरम होता है । ।