एक ग़ज़ल उनको ,नज़र करके देखते हैं
आज उनकी बात पर, उज़्र करके देखते हैं
हम तो हर कदम पे,उनके मुआफ़िक ही रहे
आज कुछ देर को, इनाद तो करके देखते हैं
चलो आज समंदर की,सैर करके देखते हैं
लहरो में जरा देर,सर् छुपा कर देखते हैं
समंदर की गहराई को ,माप कर देखते हैं
तलातुम से आज, फसाद करके देखते हैं
चलो आज उनको,निगाह भरके देखते हैं
अपने आस्ताँ पर ,पजीराई करके देखते हैं
जरा आराइशों की ,सताइश करके देखते हैं
आज खुद ही खुद को,माफ करके देखते हैं
कुछ देर को,बैतूल हरम में जाके देखते हैं
खुदा की कुछ देर ,पुरशिश करके देखते हैं
किसी पामाल को ,दरपेश करके देखते हैं
आज तो खुदा के,सज़दे में जाके देखते हैं
मुद्दतें हो गयी हमें ,यूँ ही गुनाह करते करते
चलो एक सबाब का ,काम करके देखते हैं
मुन्तज़िर होगा ,अब तो खुदा भी वहां हमारा
चलो आज तो ,खुदा के पास चलके देखते हैं
इनाद-शत्रुता तलातुम-ज्वार भाटा आस्ताँ-दहलीज़
पजीराई-स्वागत आराइश-साज- सज्जा सताइश-
तारीफ बैतूल हरम-क़ाबा पुरशिश-कुशल पूछना
पामाल-पद दलित दरपेश-प्रस्तुत करना सवाब-
पुण्य मुन्तज़िर-प्रतीक्षारत
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