नेताओं को भी बिकते देखा है
जनता को भी घुटते देखा है
मुँह मोड़ लेते है इंसानियत से जब लोग
इंसानियत को भी मरते देखा है
अंधकार को भी बढ़ते देखा है
उजालों को भी घटते देखा है
मिल गई है ईमानदारी अब अंधकार में
इंसानो को भी डरते देखा है
ग़द्दारों को भी बचते देखा है
गरीबों को भी तड़पते देखा है
झुक रहा सर अब बेईमानों के सामने
इंसानियत को भी मरते देखा है
आशुतोष पाण्डेय
प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश
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