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ग़ज़ल

Atul Pundhir

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये चलन है तो यही तकदीर होनी चाहिए
        
                                                    
                            
आइनों पे झूठ की तस्वीर होनी चाहिए

रात से कह दो ये ख्वाबों का बिछौना फाड़ दे
ख्वाब हैं तो ख्वाब की तावीर होनी चाहिए

तुम हुकूमत के नशे में तुम क्या समझोगे हमें
गर समझना है तो दिल में पीर होनी चाहिए

आसमाँ उड़ने को है फिर पंख को क्यों तोड़ते
बेटियों के पैर ना जंजीर होनी चाहिए

सिसकियाँ सुनता गरीबों की यहाँ अब कौन है
हूक दिल की अब कलेजा चीर होनी चाहिए

अब नहीं महफूज़ माँ की कोख में भी बेटियाँ
हाथ में बेटी के अब शमशीर होनी चाहिए

सिर्फ हंगामे की बातें लोग सुनते हैं अतुल
दूर तक चीखों की अब तासीर होनी चाहिए

- अतुल पुण्ढीर

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8 वर्ष पहले
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