विज्ञापन

'साहस'

Ayush Mudgal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब नाकामी का अंधेरा घनघोर दिखाई देता हो,
        
                                                    
                            
जब नीरसता का ही मंजर सब ओर दिखाई देता हो
जब जीवन में साहस का अंतिम छोर दिखाई देता हो
जब किस्मत में हेर-फेर का दौर दिखाई देता हो

जब हंसों के हिस्से के मोती कौए खाने लगते हों
जब कोयल के राग मल्हारी उल्लू गाने लगते हों
धूर्त कुटिलों की आँखों में चमक दिखाई देती हो
और साथी भी हाथ छोड़कर आगे जाने लगते हों

जड़ बुद्धि के ढोर हमारी निंदा करने लगते हों
हम से ज्यादा 'और' हमारी चिंता करने लगते हों
षड्यंत्रों के तीर पीठ को घायल करने लगते हों
और 'शुभचिंतक' जहाँ- तहाँ शर्मिंदा करने लगते हों

तो जरूरत है हिम्मत से डटकर किस्मत से टकराने की
जरूरत है संभव की सरहद से आगे बढ़ जाने की
बातों से प्रतिउत्तर देना कर्मवीर का काम नहीं
जरूरत है कर्तव्य पथ पर अमिट कर्म कर जाने की

याद रहे कि धीरों का घबरा जाना व्यवहार नहीं
काँटों से डरकर फूलों का मुरझाना व्यवहार नहीं
विपदाएं तो आती जाती हैं पर उनसे घबराकर
बकरी के जैसे, शेरों का मिमियाना व्यवहार नहीं

ये सब निंदक, शुभचिंतक जो ढेर बनाते बातों के
कोई किसका सगा नहीं सब संबंधी हालातों के
एक बार गर सफल हुए तुम जो जीवन की राहों में
फिर ये सब तो कठपुतले बनकर नाचेंगे हाथों के

- आयुष मुद्गल
2 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all