पलते हैं अपराध जहाँ पर ,
जीवन इक अभिशाप है !!
निर्धनता जहाँ द्वार खड़ी हो ,
अँधियारों के डेरे हो !
खुशियाँ जहाँ चिकोटी काटे ,
समय खड़ा मुँह फेरे हो !
पाप पुण्य में भेद न कोई ,
वहीं पले बस पाप है !!
जहाँ अशिक्षा पैर पसारे ,
ज्ञान पे बस पर्दा डाले !
जूझ रहें हो नित अभाव से ,
पड़े पैर में हों छाले !
राह न सूझे इधर उधर की ,
गुनाह छोड़ता छाप है !!
संगत से मिलते हैं सुख तो ,
संगत दुख का कारण है !
संगत ही अपराध कराये ,
संगत ही बस मारण है !
जहाँ जान की कीमत भूले ,
रोज विपद का जाप है !!
सुविधाओं का नशा चढ़े गर ,
पलते कभी गुनाह यहाँ !
सरमायेदारों की सेवा ,
पनपे हैं अपराध यहाँ !
कभी प्रवृति भी रंग लाती ,
सबब बने बस आप हैं !!
अपराधों का संरक्षण भी न ,
सचमुच है अपराध बड़ा !
मौत खड़ी है सम्मुख फिर भी ,
सिर पर है अपराध चढ़ा !
राजनीति भी रंग देती है ,
भुगते जनता श्राप है !!
सदाचरण को जाने समझे ,
नैतिकता का पाठ पढ़ें !
यहाँ अवनति गर्त है जानो ,
इसमें कभी गिरे न पड़ें !
संभल संभल कर डग भरना है ,
वरना तो संताप है !!
स्वरचित / रचियता :
बृज व्यास
शाजापुर ( मध्यप्रदेश )
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