पहाडों की गोद में यूँ शुकून सा है
शांत सा जीवन , कोई नहीं बस मैं हूँ
नदियों की लहरों को किनारे पत्थरों में बैठ
अदभुत है यूँ प्रकृति को निहारना
मन मस्तिष्क हवा में बह जाना चाहता है
मानो सत्य से रुबरु होना चाहता है
पहाड़ो की गोद में यूँ शुकून सा है
हरे भरे जंगलों नदियों नालों जहाँ जायें
यूँ महसूस सा लगता है कोई अदृश्य बतियाना चाहता हो
कैसे कोई चुम्बक सा खींचे जा रहा है
जीवन की इस लम्बी थकान को
यूँ शुकूँ सा मिलता है
जैसे कोई पथिक को चिलचिलाती धूप में
राह चलते दिख जाता है विश्रामपथ
पहाड़ों की गोद में यूँ शुकून सा है
शहरों की आबो-हवा,भाग-दौड़ के इस जहर में
यूँ शुकूँ सा मिलना , स्वर्ग है यहीं तो है
मन कहता है यहीं ठहराव करुँ
जीवन से साक्षात् साक्षात्कार करुँ
मैं क्यों भागदौड़ करता रहा
जबकी जाना सब यहीं छोड़ है
भाग्यशाली हूँ,जो मेरा एक आशियाना पहाड़ में है
पहाड़ों की गोद में यूँ शुकून सा है
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