न्यारी म्हारी संस्कृति, देवै सभनै मान।
मात पिता अर गुरु का, करते सब गुणगान।
करते सब गुणगान, देस की महिमा न्यारी।
घी दूध का खाणा, चोखी खिली फुलवारी।
कहै भारती खूब, प्यार तै रह नर नारी।
सिखलावै संस्कार, म्हारी संस्कृति न्यारी।
-भूपसिंह भारती
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।