वो रोज़ गिरकर घुटनों के
घावों में महीन मिट्टी भरना
डंडे को गिल्ली से नाप कर
अंकों के लिए झगड़ना
अपने सखा से बहस में
गिरेबां पकड़ कर भिड़ना
पर उसी के लिए पराये लड़कों से
सांस फूलने तक लड़ना
क्या दिन थे वो बचपन के
खुशियों का जमघट था
बस बस्तों का बोझ छोड़ के
सब कुछ ही नटखट था
न पाने कोई आशा थी
न खोने का कुछ था डर
रुपया दो रुपया पाने को
बड़ों पे रहती थी नज़र
वो उम्र में बड़ों को "तू"
कहने का था मजा
लड़की को रानी बनाके
खुद बन जाते थे राजा
कहीं हुई कोई बात को
न मानने का आनंद
पिटाई थी मंजूर भले
कमरे में कर दो बंद
वो एक कहानी की किताब
दस दोस्तों में विचरती थी
गर्मी की छुट्टियों की आस में
हर दिन हर रात गुजरती थी
कितनी अच्छी हो कोई रात
जब सोकर के हम जगें
जवानी पीछे छूट जाये
बस वो बचपन ही हो आगे
भूपेंद्र श्रीमाली घाणेराव(राजस्थान)
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