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बिखर जाएंगे

भारद्वाज 'समद'

Mere Alfaz
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                            डाल से फूल की मानिंद बिख़र जाएँगे
        
                                                    
                            
तुझसे छूटे तो बता और किधर जाएँगे

रोज़ घुट घुट के तड़पते हुए जीते जीते
ज़िन्दगी हम तेरे ही हाथ से मर जाएँगे

किस ने दे दी ये ख़बर आज तेरे आने की
अब दिवाने यहाँ कुछ देर ठहर जाएँगे

क्या वो आंखों में समंदर को लिए आते हैं
हाँ जो ऐसा है तो हम डूब के मर जाएँगे,

अश्क़ भी सूख रहे हैं मेरे रफ्ता रफ्ता
ग़म के मौसम जो ये आये हैं गुज़र जाएँगे

एक टूटे हुए से दिल की मरम्मत करने
वो कहाँ चाँद से धरती पे उतर जाएँगे

मेरी आँखों में लहू था जो वो भी सूख गया
ये मेरे ज़ख़्म भी कुछ देर में भर जाएँगे

जिसके सीने के क़फ़स में यूँ हमारा दिल है
आज उस बे-रहम सय्याद के घर जाएँगे

वो अगर सादगी से देख रहे थे हमको
तो "समद" हम भी इरादों से मुकर जाएँगे

- भारद्वाज "समद"

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8 वर्ष पहले
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