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राहे वफ़ा में...

Binish Raza

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तेरे  बगै़र  दिल  का  गुजा़रा  नहीं   होता
        
                                                    
                            
तेरे    बगै़र  जीना  गंवारा   नहीं   होता

यूँ तो मरते हैं दुनिया में हर रोज़ कई  लोग
राहे  वफा़ में  मरना  ख़सारा   नहीं  होता

प्यास भी शिद्दत  की  बूझाता   नहीं  सागर
बंद  आँखों से  कभी  कोई इशारा नहीं होता

अर्स-ए-एहसास में  उबरते  हुये  डूब गये
उस समुन्दर में जहाँ कोई किनारा नहीं होता

तहजी़ब-ए-आरजू़  में मोहलत नहीं शक की
आफ़ताब  के आंगन में सितारा  नहीं  होता

हम क्या गये शहर में  तग़य्युर ही  आ गया
साया  कभी  किसी का  सहारा  नहीं होता

अपने ही ग़मे इश्क़ में जल जल के हुये खा़क
 जो आतिश पे ठहर जाये वो पारा नहीं होता

हमने देखा ही नहीं दुनिया कभी तेरी नज़र से
सच  बोलने वाला तो  बेचारा   नहीं   होता

इक मैं हूँ कि  जि़न्दा  हूँ  ऐ बुत तेरे हरबे में
ये  दिल नहीं होता  तो  तुम्हारा  नहीं  होता

ये दिल ही जागीर  है  वाहिद  मेरी हस्ती का
गर दर्द  न  होता  तो  हमारा  नहीं   होता

अरमान-ए-नज़र होते हैं  यूँ  तो सभी  बीनिश
हर  शख़्स  मगर  आँख  का  तारा नहीं होता

 - हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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