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दाग़ या ताज़

Chanchal Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम सिर्फ कोई दाग़ नहीं
        
                                                    
                            
मेरे चेहरे पर बने
एक ताज हूं
एक तुम ही तो हो
जो मेरे सबसे पास हो
तुम ना होते तो
शायद में खो जाती
झूठी खूबसूरती
की राह पर
मैं भी एक दिन
सो जाती
तुम्हारे साथ से ही तो
मैं जगी हूं
किसी और की चाहत से परे
बस खुद की बनी हूं
 
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
4 वर्ष पहले
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