एक बात मेरी जहन में आई ,
बेटी क्यों सदा ही कहलाई पराई।
देखती सुनती हूं आज समाज,
नारा देता बेटा बेटी है एक समान।
मगर दिल ही दिल में है एक बेटे का लिए अरमां।
बेटी की अनदेखी क्यों करता है निष्ठुर संसार,
बेटी है नवदुर्गा रूपी
उसकी कृपा सदैव अपार ।
बेटी तो है फूल की कली जैसी,
खुशबू से जग महकाने दो।
बंद करो उनकी हत्या अब ,
जीवन ज्योत जलाने दो ।
बेटी छल छल छल छलकती नदियों जैसी,
उसको संसार रूपी समंदर जीने
दो ।
बेटी एक कली है उसको फूल बनने दो।
क्या हूं मैं? कौन हूं मैं?
यही बात मन ही मन मैं करती थी।
लड़की हूं लाचार या मजबूर बेचारी,
यही खुद से कहती थी ।
पहचाना मैंने समाज को,
जाना मैंने रस्मों को।
तब मैंने खुद में पाया लाचार नहीं,
मजबूर नहीं मैं,
एक धधकती ज्वाला की चिंगारी हूं।
मैं कोई दाग नहीं जो तुम मिटाना चाहोगे।
मैं तो वह ज्वाला हूं जिसको,
कभी बुझा ना पाओगे।
बुझा गए अगर छल से मुझको,
सब ख़ाक राख हो जाओगे।
क्यों ना सुनाई देती तुमको,
एक बेटी की आवाज।
जो कराह रही मन ही मन अंदर,
मत छीनो उसका अधिकार।
एक बेटी का सबको है पैग़ाम
दिल से स्वीकार करो सब ,
एक बेटी भी है बेटा समान।