कभी-कभी मन में यह विचार आता है कि,
लड़कियों को लड़कों से कम क्यूं समझा जाता है?
लड़कों को कुल का वंश माना जाता है तो,
लड़कियों को बोझ क्यूं माना जाता है?
लड़कों का पढ़ना-लिखना सही माना जाता है तो,
लड़कियों का पढ़ना-लिखना गलत क्यूं माना जाता है?
लड़कों के पैदा होने पर खुशी मनायी जाती है तो,
लड़कियों के पैदा होने पर शोक क्यूं मनाया जाता है?
लड़कियों को घर से बाहर निकलने से रोका जाता है तो,
लड़कों को घर से बाहर निकलते समय उनकी मर्यादा में रहना क्यूं नहीं सिखाया जाता है?
हैरान हूं, दुखी हूं, इस आज़ाद देश में इस छोटी सोच को बढ़ावा क्यूं दिया जाता है?
- चारू चाैधरी
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