पा कर रवि रश्मि प्रबल,
गिरि-तुंगों से हिम गये पिघल
बन कर वह सलिल निर्मल,
बही एक धारा अविरल।
आये कितने विघ्न अटल,
चीर उनका वक्षस्थल,
गिर गर्तों में पल-पल,
हुई और भी दुग्ध-उज्ज्वल।
गिरिपादों पर कर कोलाहल,
शान्त हुई पा भू समतल,
लिए गोद में असीमित जल,
सर्पिणी सी बढ़ रही चंचल।
हुई ना यह कभी विकल,
देख ये विस्मय कौतुहल,
मिलना चाहूँ इसमें सकल,
एक पथ में जायें ढल।
छोड़ जग का हलाहल,
लेकर अब दृढ़ निश्चय हल,
प्रणय सिन्धु में जायें रल,
पाने जीवन का प्रतिफल।
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।