मुझसे हमदर्दी के जज्बात जताने वाले
छोड़ दे तनहा मुझे मुझको रुलाने वाले
मुफलिसी मुझको मेरे रब ने नहीं की है अता
मेरे मुजरिम हैं मेरे हक को दबाने वाले
सादगी तेरी क्यों कहता है उड़ने को मुझे
कैंचियाँ रोज मेरे पर पर चलाने वाले
तज़किरा ना कर मुझसे अपने चमकते घर का
मेरे हिस्से का लिया सूरज चुराने वाले
हक गरीबों का लिया तो ना बच पाओगे
रब के दरबार में सर अपना झुकाने वाले
दयानन्द पाठक
सिद्धार्थनगर उत्तर प्रदेश
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें