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मेरे मुज़रिम

Dayanand Pathak

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुझसे हमदर्दी के जज्बात जताने वाले
        
                                                    
                            

छोड़ दे तनहा मुझे मुझको रुलाने वाले

मुफलिसी मुझको मेरे रब ने नहीं की है अता

मेरे मुजरिम हैं मेरे हक को दबाने वाले

सादगी तेरी क्यों कहता है उड़ने को मुझे

कैंचियाँ रोज मेरे पर पर चलाने वाले

तज़किरा ना कर मुझसे अपने चमकते घर का

मेरे हिस्से का लिया सूरज चुराने वाले

हक गरीबों का लिया तो ना बच पाओगे

रब के दरबार में सर अपना झुकाने वाले

दयानन्द पाठक
सिद्धार्थनगर उत्तर प्रदेश  


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