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माँ की गोद

Deepa Gupta

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस दुनिया में आँख खुली  तो  माँ की  गोद थी पाई
        
                                                    
                            
प्रथम  गुरु मेरी  वह  जिसने  नेह  की छाँव दिखाई

अँगुली पकड़ चली पापा की एक-एक कदम बढ़ाया
राह के  काँटे  बीन-बीन कर  सुमन  मार्ग  बिखराया

विद्यालय में  नाम  लिखा  कर गुरु  का पाया दर्शन
नैतिक  मूल्यों  का  जीवन  में  सुन्दर था आकर्षण

नींव  हुई   मजबूत   पढ़ी  महापुरुषों  अमृत  वाणी
नाम उसी का लेगी सृष्टि जिसकी हो अमिट कहानी

ललक  जगी  कुछ  ऐसा  ही  मैं  भी  तो  कर जाऊँ
धरती माँ की  बिटिया  प्यारी  मैं  बनकर दिखलाऊँ

चला  समय  का  चक्कर  ऐसा बिटिया हुई सयानी
डोली  बैठ साजन के घर  अबआ  गई वह दीवानी

पत्नि, माँ ,भाभी ,चाची, और बहु बनी वह बिटिया
हर्षित  हर  बंधन  को सींचा न थी अब नौसिखिया

समय  चला  पँख  फैलाकर  हरषाया  नव  अंकुर
इच्छा दबी जो मन के भीतर मिले भावों के अंकुर

फली  बड़ी  वह बेल  बहुत  सघन  हुई  कालांतर
विस्तृत  हुआ  क्षेत्र  जीवन  का भय हुआ छूमंतर

गढ़ने  लगी  इतिहास  नया  कर नव सृजन संचार
क्षेत्र कोई न रहा अछूता की प्रत्येक विधा स्वीकार

बढ़ी  चली है  कदम  रुकें  न ,स्वर्ग धरा बन जाय
स्वप्न यही बचपन से पला सम्मान हर सुता पाय

भेद  मिटे   बेटा-बेटी  का  मुरझाए  नहीं  बचपन
चन्दा  तारे  तोड़ कर  लाएं बचपन हो या पचपन

- दीपासंजय *दीप*

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