अनुताप से घटती कब,अंतर्मन की पीर।
अंतर्मन की पीर करे, घाव गहन गंभीर।।
कुबड़ी दासी सीख दी, रानी कैकई मात।
पुत्र मोह में भूल गई , पाई हर सौगात।।
दशरथ जी से मांग लिए,पूर्व दिए वरदान।
मिले राज सुत भरत को,वन जाएं सुत राम।।
दिया निमंत्रण विपत को,कैसे विधि के लेख।
शोक मग्न जन-जन हुआ,दुख में डूबा देश।।
बुद्धि रहती शेष अगर,करती तनिक विचार।
तनय मोह में जल गया,भरा पूरा परिवार।।
पुत्र भरत का भातृ प्रेम, देख करे संताप।
आत्म ग्लानि जला रही ,करती पश्चाताप।।
डॉ दीपा संजय दीप
बरेली, उत्तर प्रदेश