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यूं ही

Deepali Agarwal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यूं ही,
        
                                                    
                            
अचानक से मन बुदबुदाता है,
चेहरे पर एक हसी खेल जाती है।
ज़िन्दगी की नैया को पार तो कभी और लगा लेंगे।
आज बस यू ही,
डूब जाने दो,
कल्पना के इस खूबसूरत बाजार में।

यूं ही,
दिल कर जाता है,
सब छोड़कर,
उस आसमान को देखने का।
बस यू ही,
रात आ जाती है,
उस अनंत, असीम क्षितज पर।

यूं ही,
मन मचल जाता है,
उन कोरे कागजों पर,
सिहाई फेरने को।
बस यू ही,
मेरे अन्दर का छुपा कलाकार जग जाता है।

यूंही,
हृदय कामना करता है,
वक़्त की रेत की तरह,
आज बह जाए ये शब्द कागज पर।
बस यू ही,
मेरा छोटा संसार जीवित हो जाता है।

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कभी-कभी लिखना एक बहुत खूबसूरत एहसास हो जाता है। अपनी भावनाओं को शब्दों के माध्यम से उजागर करना, मन को भा जाता है।


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले
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