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भीड़ सताती है

deepali kalra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भीड़ अक्सर सताती है,कोई तो राज है ना,
        
                                                    
                            
दिल में दर्द है, दर्द में डर है,
ये कैसा फ़लसफ़ा है, जो अनसुना है,
ज़रा ये क़िस्सा कैसा है , वो हमें भी तो सुनाओ ना।
क्या सोच रही हो, कोई गहरा ख़ौफ़ तो नहीं है ना,
तुम्हारा सहमना कोई खुला घाव है या अंदरूनी चोट लगती है,
जिसे पहचानना भी कठिन हो रहा है,और समझना भी कठिन हो रहा है,
सच - सच बताओ,कोई तो दिल में बात छुपाए बैठी हो ना।
आज कह दो सब कुछ, हम सब तुम्हारे ही तो है ना,
क्या ख़ौफ़ करना है, क्या सहमना है,
अब इन बेचैन आँखों को आराम देना है, इस धड़कन को धड़काना है,
इसके लिए तुम्हें,एक नयी राह को चुनना ही होगा ना।

आँखों के आँसूँ बेहद क़ीमती है, इन्हें ऐसे तो न बहने दो ना,
एक दिन सब अच्छा होगा, और ऐसा ही होना है ,
ऐसा भरोसा तुम्हें रखना है, ऐसी उम्मीद तुम्हें रखनी है,
क्यूँकि आगे, एक अच्छा जीवन तुम्हें ही तो बिताना है ना।

मंज़िल अगर दूर लगती है तो उसे भी तो तुम्हें ही क़रीब लाना है ना,
आगे बढ़ना है, रुकना नहीं है,
तुम्हारी अच्छाई को बुराई की नज़र से बचाना है,
इस सपने को भी तो, तुम्हें ही सच कर दिखना है ना।

भीड़ अक्सर सताती है,कोई तो राज है ना,
दिल में दर्द है, दर्द में डर है,
ये कैसा फ़लसफ़ा है, जो अनसुना है,
ज़रा ये क़िस्सा कैसा है , वो हमें भी तो सुनाओ ना दीपाली कालरा
नई दिल्ली

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