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नज़्म : तू

Deepanshu Pandit

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर सम्त तू ,
        
                                                    
                            
फिर भी मुझे,
तेरी आरज़ू ,
कैसी है ख़ू 

तू है नज़र
मंज़र भी है
दरिया है तू
बंजर भी है
तू हर जगह
तू गुमशुदा
तू संग मेरे
फिर भी जुदा

तुझे जान लूं
पहचान लूं
मुझको यही
तू ज़र्फ़ दे 
तुझे कर सकूं
मैं बयां कभी
बख़्शीश में
वो हर्फ दे 
सैलाब भी 
तू नाख़ुदा 
तू काफिरा
तू ही ख़ुदा

मैं कौन हूं
मैं हूं ही क्यूं
मरना ही था
तो जीना क्यूं
ये ज़िन्दगी
की पहेलियां
मेरी उलझनें
हैं सहेलियां
हर दम मेरे
ये साथ में
मेरी कही
हर बात में
ज़ाहिर है तू
साहिर है तू 
तू आम सा
माहिर है तू
मैं कौन हूं
बस जाने तू
मेरी तो एक
ना माने तू
ना बोलता
ना चुप रहे
हो सामने
पर छुप रहे

तू रंज भी 
तू है ख़ुशी
ये कैसा मंज़र
आ गया
है जान का
दुश्मन मगर
तू ही है दिल
को भा गया
ये प्यार वो
व्यापार है
जिसका नफा
परेशानियां
ये रूह पे
चोटें हैं जो
ये इश्क़ की
हैं निशानियां

तू ही ज़मीं
तू आसमां
तू है यकीं
तू ही गुमां
मासूम भी
चालाक भी
ख़ालिस कभी 
नापाक भी 
कभी फूल है
कभी सूल है
जैसा भी है
तू क़ुबूल है

- दीपांशु पंडित (मुंबई)
 
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