चूम चूम कदमों को मेरे
बार-बार वह आएगी ...
लाख छुड़ाए दामन मुझसे
छोड़ मुझे कहां जाएगी ...
सौ बार हराते चाहे मुझको
लेकिन तू जीत न पाएगी...
ले मेरी परीक्षा बार-बार
उतना मजबूत बनाएगी...
है तेरी चुनौती स्वीकार मुझे
यह जीत मेरी हो जाएगी ...
यह जीत मेरी हो जाएगी
ले अंतिम संकल्प लिया मैंने
अब लक्षय भेदना है मुझको
कांटों भरी राह भी मुझे रोक नहीं पाएगी ...
यह कामयाबी लौटकर
मेरा दरवाजा खटखटायेगी
मेरे सूने गले में हार ही हार होंगे
पर लौट के हार नहीं आएगी ...
बिखर गई धरा पर कहां तू
मगर लौट कर मेरी मुट्ठी में आएगी...
-----दीपचंद सागर