समय दिन तारीख
मौसम महीना वार,
शब्दों में क्या मैं बयां करु
कितना हमे एक -दूजे से प्यार
कई बातें मेरी तुमने समझी
मुझे भी याद किस्से हज़ार
जिनमें न शब्द थे न संकेत
केवल थे अनकहे भाव,
कोई दिन विशेष तारीख या
मनाऊं क्या इस प्रकार
भला मां का भी चुका सकते
हम कभी आभार।
बहुत धैर्य और संयम तुममें
असीम अपार तुम्हारे विचार,
इस भाग दौड़ की दुनिया में
तुम मेरे वट वृक्ष समान,
बहुत अधूरे खाब है,
कुछ तुम्हारी कुछ मेरी चाह
बस हर दम यूं ही अटूट सा
तुम रखना मुझपे विश्वास
रहीं बांटती खुशियां तुम
चाहे कितनी हो उदास
हो रहे देख सभी देव धन्य
देख देवी रूप जननी का वास
नहीं कहानी का अंत है कोई
ना ही कोई पूर्णविराम।
हे जननी तुम प्रभु तुल्य हो
करती तुमको सादर प्रणाम।
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