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किसान का दर्द

Dev Verma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी बचपन मे पढ़ा था मै
        
                                                    
                            
किसानो की वो गर्व गाथा ,
हर सुबह वो खेतो में
फावड़ा लेकर निकल जाता ,

एक छोटे से खेतो में
क्या क्या वो उपजा पाता ,
किसानो का दर्द इतना
किसको वो समझा पाता ,

कभी मौसम का मार झेला
कभी वर्षा की आश लगाई ,
कैसे हो अब दुगनी आय
अब सरकार से गुहार लगाई ,

सच्चाई यह है कि किसान
ईमानदारी से अपना कर्ज लौटाता है,
कर्ज न लौटाने की स्थिति में ही
किसान कर्जमाफी के लिए छटपटाता है ,
जब सरकार नहीं मानती तो
वह आत्महत्या भी कर लेता है ,

कई किसानों ने फसलों को
खेतों में ही नष्ट कर दिया।
क्योंकि बाजार में इन फसलों की कीमत
कई गुना कम कर दिया ,

जबकि सूखा ओलावृष्टि किसानो
को भारी नुकसान पहुंचाती हैं,
जबकि इनके बदले मुश्किल से
कुछ ही रुपये सरकार से मुआवजा
मिल पाता है,

सीमांत किसान अब कैसे अपनाये
उन फसलो के विविधताओ को ,
कभी लागत भी न आ पाये
उन फसलो की किमत की ,

इन लहलहाती फसलो में
देखो कितना दर्द भरा हैं ,
हर बार की तरह देखो
बस केवल किसान मरा हैं ,

अगर ना हो अनाज
तो क्या रूपये पैसे खायेगे हम ,
अगर किसान के असमिता
की रक्षा नही हुई तो ,
क्या खुद खेतो मे फसल उपजायेगे हम ,

अगर ना हो किसान तो
खेतो मे कौन फसल उपजायेगा ,
फिर सोचो कैसे बिना किसान के
भारत देश महान कहलायेगा ,

कर नही सकता बया मैं
उस किसान के दर्द को,
कैसे समझाये हर किसी को वो
अपने फसलो के वास्तविक मूल्य को,

कभी बचपन मे पढ़ा था मै
किसानो की वो गर्व गाथा ,
हर सुबह वो खेतो में
फावड़ा लेकर निकल जाता....

(लेखक :आशीष कुमार वर्मा)

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