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दबे कदमों से

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दबे कदमों से तुम ख्वाबों मे, जब भी पास आती हो,
        
                                                    
                            
न जाने बन्द आँखें क्यूं आहट तेरी जान लेती हैं।
हजारों मील लम्बे काफिलों के साथ जाते हो,
मगर हम चांद सा मुखड़ा तेरा पहचान लेते हैं।

जाने ये कैसा रिश्ता है, कहां का कौन सा नाता,
हमारा दिल तुम्हारे दिल की बातें जान लेता है,
हजारों साज बजते हो, हजारों गीत गाते हों,
मगर आवाज हम तेरी वहां पहचान लेते हैं।

होंठ हिलने से पहले नगमों को हम जान लेते हैं
मगर हम जान कर भी यूं ही अनजान रहते हैं,
तेरी आंखों की झीलों की हिलोरें पास आती हैं
कभी हम भीग जाते हैं, कभी हम डूब जाते हैं।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले
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