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अक्षर...

Dinesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अक्षर-अक्षर घूम रहा है,
        
                                                    
                            
जग में चारों ओर।
अपनी आजादी को लेकर,
उलझ गया अक्षर-अक्षर से।
शब्द बनाते नहीं बनते अब अक्षर॥ अक्षर...
एक को जोड़ा दूसरे से,
दूसरा टूटा पहले से।
अपनी आजादी के मद में,
गिर गया अक्षर-अक्षर से।
उठाये नहीं उठता अब अक्षर॥ अक्षर...
एक होश में आता है तो,
दूसरा बेहोश हो जाता है।
ना जाने किस पिपासा में,
डूब गया अक्षर-अक्षर में।
तैराते नहीं तैरते अब अक्षर
बीच भंवर में फंस गए।
आजादी के मोह को लेकर।
ना किनारा मिलता है।
ना अंत दिखाई देता है।
आजादी के दलदल में,
फंस गया अक्षर-अक्षर में।
छुड़ाए नहीं छूटता अब अक्षर
बेबस जब होता अक्षर-अक्षर से,
दोष भाषा को देता है।
कौन बताए मूर्ख को,
वर्णमाला उसका घर है।
आपस में मिलकर शब्द रूपी,
परिवार बनाते क्यों नहीं है।
सुनकर अपनी ऐसी निंदा,
समा गया अक्षर-अक्षर में
शब्दों की प्यारी जुगलबंदी से,
वाक्य रूपी समाज बन गया।
फिर वाक्य-वाक्य से मिलता गया।
पैराग्राफ रूपी देश बनता गया।
जब समा गए सारे पैराग्राफ किताब में,
किताब रूपी सुंदर विश्व बन गया।
तब जाकर आजादी का अर्थ समझ में,
आ गया अक्षर-अक्षर को

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6 वर्ष पहले
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