मेरे प्रियतम तेरा दर्पण, मेरा 'चितवन' न देखे है
यह रुप मेरा, श्रंगार मेरा, बस चार दिनों के धोखे हैं
न मधुशाला की गगरी है, ना झंकारे है झांझर की
न गली में मेरे हो,महफिल है, है बस खामोशी अंधियारो की
न सीता सा है धैर्य मेरा, ना राधा सी चंचलता है
न धारा, पे मेरा जोर कोई, मुझमें गंगा सी व्याकुलता है
न अंबर में फैला मान हूं मैं,ना वसुधा सा शोभित स्वाभिमान हूं मैं
आलोचना की बंधक हूं, पर नारी का अभिमान हूं मैं
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