मैं आँसू हूँ कुछ नयनों का, मुझको आज बहने दो,
दर्द-खुशी की बातें मुझको,जरा सा आज कहने दो।
कासिद हूँ हर ग़म का मैं, और खुशी जतलाता हूँ,
वक़्त-नद के आब सरीखा, जरा सा आज बहने दो।
क्यों 'दिल्लगी' कहते हो, इस 'दिल-लगी' को मेरी?
मुझको इश्क़ के दरिया में, जरा सा आज बहने दो।
ज़िंदगी है चार दिनों की, जी लो इसे खुशफहमी में,
कह के बातें खुशी की तुम, ग़म को आज रहने दो।
क्या जायेगा संग तेरे, जब महाप्रयाण को जाओगे,
इसीलिए तो संग कृष्ण के, इश्क़ में आज रमने दो।
- डा० कृष्णानन्द शुक्ल 'कृष्ण गोरखपुरी'
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