”सिर्फ धुँआ”
सिर्फ धुँआ...क्यों निकलता है
तुम्हारे दिलों से?
एक ऐसा धुँआ.जो उजाड़ देता है...
बसे- बसाए घर...
जो छीन लेता है...
नन्हीं किलकारियाँ महकते आँगन से...
जो मिटा देता है
"लाल रंग" नाजुक हथेलियों से...
जो काट डालता है...
उन मजबूत कलाईयों को
जिन पर सजा करती थी राखी कभी...
और छीन लेता है...
उन बूढ़ी आँखों का नूर
जो इंतज़ार में कभी झपकी ही नहीं...
देखता रह जाता है वो दरवाजा
जिसकी चौखट पे कोई अब चढ़ा ही नहीं।
डॉ०भावना कुँअर
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