संसार चक्र के हेतु प्रकृति, ने किया श्रृजन सौन्दर्य युक्त,
यह श्रृजन नहीं था हेतुक है, कल्याण सदा सम्पदा शक्ति,
संयोजन है सम्पूर्ण श्रृजन, जो करे मनु को पूर्ण व्यक्ति,
करने को आई यह नारी, बन नारायणी नारायण भक्त।।(१)
हे पूर्ण सृजित सानंद सघन, आनंद खानि जग निर्माणक,
हे स्नेह प्रेम की पूर्ण ध्वजा,मानव जीवन की प्रतिपालक,
निर्मित साधन की मूरति हो,हो जग रहस्य की उद्गारक,
नारी तू स्वछ सनातन है, अंतर्मन की तू स्वत: युक्ति,(२)
प्रकृति का पूर्ण श्रृजन नारी,जो मानवता को पूर्ण करे,
नारी जग की पालनकर्त्ता, सुख-दुख से रहे सदैव परे ,
कर्तव्यबोध का वरण करे, प्रतिपालक बन उत्थान करे ,
वह प्रकृति धारिणि संघर्षक,जो स्वयं कठिन ब्रत वरण करे,(३)
आवो हम सब यह ब्रत ले लें, संरक्षण नारी का सदा करें,
नारी से जन्म लिया हमने,कर पोषण ऋण को सभी भरें,
कर संवर्धन कर संरक्षण, नारी सशक्ति सम्पूर्ण करें,
नारी खुद से बन नारायणी, संसार श्रृजन को पूर्ण करें।(४)