दिल में हैं कुछ और
और ज़ुबाँ पे कुछ और
बस इल्ज़ाम लगा दिया
और कर दिया इक ओर
बोलते हैं मीठा मग़र
मन में है शायद चोर
दिल से तो अच्छे है
लेकिन कडवे हैं इनके बोल
अपने ही तराज़ु में
अपने ही हिसाब से
हम करते रहते हैं
सब रिश्तों को तोल मोल
जब चाहा बुरों में अच्छा बता
अपने से लिया जोड़
जब मर्ज़ी महफ़िल में बुला
दिल को दिया तोड़
कौन है कैसा और है क्या
क्यूँ टटोलेें किसी का मौन?
व्यक्तित्त्व किसीका परख़नेवाले
आख़िर होते हैं हम कौन?
❤ईशानी
हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें