जमींदरोंज हो चली है सब मशीनें
जो भाग रहीं थीं आसमां होने के लिए
खिली है पंखुड़ियां फिर से उन रिश्तों में
छोड़ चुके थे जिन्हें हम पत्थर होने के लिए
नाम न दो इसे अजाब का प्रवीण
जब-2 बढ़ा है खराबा इस दुनिया में
मजबूरन ये यों करना पड़ा है खुदा को
इंसा को इंसा बनाने के लिए
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