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हमदर्द

gaana mandi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हमदर्द कैसे-कैसे हमको सता रहे हैं
        
                                                    
                            
कांटों की नोक से जो मरहम लगा रहे हैं

मैं भी समझ रहा हूं मजबूरियों को उनकी
दिल का नहीं है रिश्ता फिर भी निभा रहे हैं

भटका हुआ मुसाफ़िर अब रास्ता न पूछे
कुछ लोग हैं यहां जो सबको चला रहे हैं

पलकें चढ़ी ये आंखें जो नींद को तरसतीं
सपने मगर किसी के इनको जगा रहे हैं

शिवकुमार बिलगरामी
 
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