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दो आँखें

Garima Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            दूर किसी कोने से कुछ देख रही हैं दो आँखें,
        
                                                    
                            

जल रहा है हर पेड़-पौधा, बगीचा-बाग़,
घर-घर के आँगन में लगी है आग।

कतरा-कतरा झुलस रही है चेहरों की मुस्कान
तिनका-तिनका टूट रहा है हर मोहल्ला-मकान ।

दूर किसी कोने से कुछ देख रही हैं दो आँखें

हर मोहन सलीम से आँखें फेरता है,
हर रहीम राम से मुँह मोड़ता है।

आज मंदिर की घंटी कुछ कानों में पड़ती नहीं,
आज मस्जिद की अजान पर कुछ आंखें जगती नहीं,

दूर किसी कोने से कुछ देख रही हैं दो आँखें

डाकिये को मिलते हैं अलग से नाम हर चिट्ठी पर, 
हैं नफरत, आक्रोश, ईर्ष्या, भय से नाम चिट्ठी पर

अब दिन हैं धूसर से, काली स्याही सी रातें हैं, 
इधर-उधर सड़कों पर दौड़ रहे सन्नाटे हैं ।

दूर किसी कोने से सब देख रही हैं दो आँखें,
कुछ गीता सी है, कुछ कुरान सी हैं दो आँखें,
कुछ गीता सी है, कुछ कुरान सी हैं दो आँखें ।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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