जन मत देने वाली जानता है
इन नेताओं को चुनने वाली जनता है
नौकरी दो या छोकरी दो कहने वाली जानता है
भूख मिटाने के लिए गाँव को छोड़
शहर जाने वाली जनता है
इस बार फसल खराब होने से जो
मरता है वो जनता ही होती है साहब
जिस दिन ये जनता जग गई तो
जरा सोचिए जो फाँसी लगा सकते है
वो फाँसी लगवा भी सकतें हैं
ये तो नासमझ जनता हैं साहब
जो इनसे दो मिठी - मिठी बातें करते है
उस की बातों मे आ जाते हैं
ये भोले - भाले जनता ही होते है, सहाब
अगर जनता चाह ले तो साहब
आप लोग जो ए.सी. कार में जो
घुमते हैं वो भी छीन जाएगा
हम को विश्वास है एक दिन
जनता जरूर बदलेगी।
- गौरव रईज
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।